देश की कोरोना की जंग पर भारी है लखनऊ नगर निगम का बाबू By आशीष अवस्थी2020-05-05
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05-05-2020-
लखनऊ इस कोरोना के संक्रमण काल में नगर निगम के लिए सबसे जरूरी क्या है? आप कहेंगे कि सबसे जरूरी है कोरोना से लड़ाई लेकिन यह जानकार आश्चर्य में पड़ जाएंगे कि इस समय नगर निगम की प्राथमिकता लग रही है एक रसूखदार बाबू का सेवा विस्तार. यह हम नहीं कह रहे बल्कि लेखाकार सत्येन्द्र कुमार सिंह को सेवाविस्तार दिलाने के लिए लखनऊ नगर निगम से लेकर मुख्यमंत्री कार्यालय तक हो रही लिखा-पढ़ी कह रही है. सत्येंद्र कुमार सिंह जो मूलतः लेखाकार हैं लेकिन बरसों से लखनऊ नगर निगम में बजट सील का काम देख रहे हैं, जो एक मलाईदार जगह मानी जाती है. इनकी सेवानिवृत्ति इसी माह 31 मई को होनी है. इसके लिए बाकायदा शासन की ओर एक पत्र भी नगर आयुक्त को भेजा गया है. जिसमे सत्येंद्र कुमार सिंह के सेवाविस्तार के लिए यथोचित कार्यवाही के लिए लिखा गया है. इस पत्र में सुसंगत नियमों और शासनादेशों के अधीन कार्यवाही करने को कहा गया है. इस पत्र की जानकारी होने पर ही नगर निगम में इसको लेकर चर्चा शुरू हो गयी है. इसकी वजह ये है बरसों से नगर निगम में कई नगर आयुक्त आये और चले गए लेकिन सत्येंद्र सिंह की हैसियत में कोई कमी नहीं आयी. नगर निगम के एक अफसर नाम न छापने की शर्त पर बताते हैं कि सत्येंद्र सिंह का जितना रसूख है, उतना ही विवादों से नाता रहा है. लेकिन कोई भी नगर आयुक्त इस बाबू की राजनीतिक पहुँच के चलते उसकी विभागीय ताकत में कटौती करने में नाकाम रहा. इस बाबू ने अनुचित ढंग से नगर निगम से कई विभागीय लाभ भी लिये. 58 साल की उम्र में सेवानिवृत्ति में होने वाले लाभ का फायदा भी उठाया और 58 साल में सेवानिवृत्ति भी नहीं ली और अपनी 60 साल की न केवल नौकरी की बल्कि सेवाविस्तार का भी प्रयास हो रहा है. कायदे से उन लिए गए फायदों की रिकवरी होनी चाहिए, साथ ही कार्रवाई भी. लेकिन कार्रवाई तो दूर की बात है, उलटे सेवाविस्तार की प्रक्रिया चल रही हैं. हनक ऐसी है कि जो नगर निगम लखनऊ में अब तक शहीद भगत सिंह के एक विशाल प्रतिमा तक नहीं लगा पाया है, उसने गोमतीनगर के पॉश इलाके विराम खंड 3 में इस बाबू के पिता के नाम पर एक मार्ग का नामकरण कर दिया, जहां इनका खुद आवास है. जबकि इनके पिता न तो लखनऊ के निवासी थे और न ही उनका सामाजिक जीवन में कोई योगदान है. इसको लेकर विवाद भी हुआ लेकिन रसूख के आगे पूरा नगर निगम नतमस्तक हो गया. यहाँ के जानकारों का कहना है कि बिना विभागीय अनुमोदन के सेवाविस्तार की प्रक्रिया कर्मचारी आचरण नियमावली के विरुद्ध है. इसके अलावा कोरोना के चलते सरकार सभी गैरजरूरी खर्चों में कटौती कर रही है. यहाँ तक के कर्मचारियों के तमाम वैतनिक लाभों को भी या तो टाल दिया गया है या फिर निरस्त कर दिया गया. ऐसे समय इस कर्मचारी की ऐसी कौन सी विशेषज्ञता है कि जिसकी वजह से कोरोना के संकटकाल में भी प्राथमिकता के आधार पर सेवाविस्तार दिया जा रहा है. कोरोना की इस लड़ाई में भी इनका कोई योगदान नहीं है. बल्कि कोरोना के सामान्य नियमों में अगर कोई विशेष परिस्थिति न हो तो 55 साल से ज़्यादा आयु के व्यक्ति से काम लेने से बचा जाता है है. लोग सवाल उठा रहे हैं कि फिर ऐसे कौन से हित हैं कि सेवाविस्तार के पुरजोर प्रयास हो रहे हैं.
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